September 18, 2020
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BKPK VIDEO दहेज़ का खात्मा | Dowry Article | Dowry System 2020

दहेज़ का खात्मा | Dowry Article | Dowry System 2020

विवाह कैसे करें

जैसे श्री देवी दुर्गा जी ने अपने तीनों पुत्रों (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) का विवाह किया था, इसी पुस्तक में आगे पढ़ेंगे। मेरे (लेखक के) अनुयाई ऐसे ही करते हैं। 17 मिनट की असुर निकंदन रमैणी है। फेरों के स्थान पर उसको बोला जाता है जो करोड़ गायत्राी मंत्रा (¬ भूर्भवः …) से उत्तम तथा लाभदायक है। जिसमें विश्व के सर्व देवी-देव तथा पूर्ण परमात्मा का आह्वान तथा स्तुति-प्रार्थना है। जिस कारण से सर्व शक्तियां उस विवाह वाले जोड़े की सदा रक्षा तथा सहायता करते हैं। इससे बेटी बची रहेगी। जीने की सुगम राह हो जाएगी।

विवाह में प्रचलित वर्तमान परंपरा का त्याग:-

विवाह में व्यर्थ का खर्चा त्यागना पड़ेगा। जैसे बेटी के विवाह में बड़ी बारात का आना, दहेज देना, यह व्यर्थ परंपरा है। जिस कारण से बेटी परिवार पर भार मानी जाने लगी है और उसको गर्भ में ही मारने का सिलसिला शुरू है जो माता-पिता के लिए महापाप का कारण बनता है। बेटी देवी का स्वरूप है। हमारी कुपरम्पराओं ने बेटी को दुश्मन बना दिया। श्री देवीपुराण के तीसरे स्कंद में प्रमाण है कि इस ब्रह्माण्ड के प्रारम्भ में तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) का जब इनकी माता श्री दुर्गा जी ने विवाह किया, उस समय न कोई बाराती था, न कोई भाती था। न कोई भोजन-भण्डारा किया गया था। न डी.जे बजा था, न कोई नृत्य किया गया था। श्री दुर्गा जी ने अपने बड़े पुत्रा श्री ब्रह्मा जी से कहा कि हे ब्रह्मा! यह सावित्राी नाम की लड़की तुझे तेरी पत्नी रूप में दी जाती है। इसे ले जाओ और अपना घर बसाओ। इसी प्रकार अपने बीच वाले पुत्रा श्री विष्णु जी से लक्ष्मी जी तथा छोटे बेटे श्री शिव जी को पार्वती जी को देकर कहा कि ये तुम्हारी पत्नियां हैं। इनको ले जाओ और अपना-अपना घर बसाओ। तीनों अपनी-अपनी पत्नियों को लेकर अपने-अपने लोक में चले गए जिससे विश्व का विस्तार हुआ।

शंका समाधान:- कुछ व्यक्ति कहते हैं कि पार्वती जी की मृत्यु हो गई थी। उस देवी का पुनर्जन्म राजा दक्ष के घर हुआ था। युवा होने पर देवी सती (पार्वती) जी ने नारद के बताने के पश्चात् श्री शिव जी को पति बनाने का दृढ़ संकल्प कर लिया और अपनी माता जी के माध्यम से अपनी इच्छा पिता दक्ष को बताई तो राजा दक्ष ने कहा कि वह शिव जी मेरा दामाद बनने योग्य नहीं है क्योंकि वह नग्न रहता है। केवल एक मृगछाल परदे पर बाँधता है। शरीर पर राख लगाकर भांग के नशे में रहता है। सर्पों को साथ रखता है। ऐसे व्यक्ति से मैं अपनी बेटी का विवाह करके जगत में हँसी का पात्रा नहीं बनूंगा। परंतु देवी पार्वती भी जिद की पक्की थी। उसने अपनी इच्छा श्री शिव जी के पास भिजवा दी और कहा कि मैं आपसे विवाह करना चाहती हूँ। राजा दक्ष ने पार्वती जी का विवाह किसी अन्य के साथ निश्चित कर रखा था। उसी दिन श्री शिव जी अपने साथ हजारों की सँख्या में भूत-प्रेत, भैरव तथा अपने गणों को लेकर विवाह मंडप पर पहुँच गए। राजा दक्ष के सैनिकों ने विरोध किया। शिव की सेना और दक्ष की सेना में युद्ध हुआ। पार्वती ने शिव जी को वरमाला पहना दी। पार्वती को बलपूर्वक लेकर श्री शिव जी कैलाश पर्वत पर अपने घर ले गए। कुछ व्यक्ति कहते हैं कि देखो! श्री शिव जी भी भव्य बारात लेकर पार्वती से विवाह करने आए थे। इसलिए बारात की परंपरा पुरातन है। इसलिए बारात बिना विवाह की शोभा नहीं होती। इसका उत्तर यह है कि यह विवाह नहीं था, यह तो प्रेम प्रसंग था। श्री शिव जी बारात नहीं सेना लाए थे पार्वती को बलपूर्वक उठाकर ले जाने के लिए। विवाह की पुरातन परम्परा श्री देवी महापुराण के तीसरे स्कंद में है जो ऊपर बता दी है।

बेटियों तथा बेटों को चाहिए कि अपने माता-पिता जी की इच्छानुसार विवाह करें। प्रेम विवाह महाक्लेश का कारण बन जाता है। जैसे भगवान शिव जी और पार्वती जी का किसी बात पर मन-मुटाव हो गया। शिव जी ने पार्वती जी से पत्नी व्यवहार बंद कर दिया तथा बोलचाल भी बंद कर दी। पार्वती ने सोचा कि अब यह घर मेरे लिए नरक हो गया है। इसलिए कुछ दिन अपनी माँ के पास चली जाती हूँ। पार्वती जी अपने पिता दक्ष के घर मायके में चली गई। उस दिन राजा दक्ष ने एक हवन यज्ञ का आयोजन किया हुआ था। राजा दक्ष ने अपनी बेटी का सत्कार नहीं किया तथा कहा कि आज क्या लेने आई हो देख लिया उसका प्रेम, चली जा घर से। पार्वती जी ने अपनी माता से श्री शिव जी के नाराज होने की कथा बता दी थी। माता ने अपने पति दक्ष का सब बताया था। पार्वती जी को अब न मायके में स्थान था, न ससुराल में। प्रेम विवाह ने ऐसी गंभीर परिस्थिति उत्पन्न कर दी कि दक्ष पुत्राी को आत्महत्या के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं देखा और राजा दक्ष के विशाल हवन कुण्ड में जलकर मर गई। धार्मिक अनुष्ठान का नाश किया। अपना अनमोल मानव जीवन खोया। पिता का नाश कराया क्योंकि जब श्री शिव जी को पता चला तो वे अपनी सेना लेकर पहुँचे और अपने ससुर दक्ष जी की गर्दन काट दी। बाद में बकरे की गर्दन लगाकर जीवित किया। उस प्रेम विवाह ने कैसा घमासान मचाया। शिव सेना को बारात बताकर कुप्रथा को जन्म दिया गया है और यह प्रसंग प्रेम विवाह रूपी कुप्रथा का जनक है जो समाज के नाश का कारण है।

विवाह जो सुप्रथा से हुआ, वह आज तक सुखी जीवन जी रहे हैं। जैसे श्री ब्रह्मा जी तथा श्री विष्णु जी।

विवाह करने का उद्देश्य:-

विवाह का उद्देश्य केवल संतानोत्पत्ति करना है। फिर पति-पत्नी मिलकर परिश्रम करके बच्चों का पालन करते हैं। उनका विवाह कर देते हैं। फिर वे अपना घर बसाते हैं। इसके अतिरिक्त प्रेम विवाह समाज में अशांति का बीज बोना है। समाज बिगाड़ की चिंगारी है।

विवाह में ज्ञानहीन नाचते हैं

एक दिन समाचार पत्रा में पढ़ा कि रोहतक का लड़का भिवानी विवाह के लिए कार में जा रहा था। उसके साथ दोनों बहनों के पति भी उसी कार में सवार थे। पहले दिन सब परिवार वाले (बहनें, माता-पिता, भाई-बटेऊ, चाचे-ताऊ) डी.जेबजाकर नाच रहे थे। उधमस उतार रखा था। कलानौर के पास दुल्हे वाली गाड़ी बड़े ट्राले से टकराई। सर्व कार के यात्राी मारे गए। दुल्हा मरा, दोनों बहनें विधवा हुई। एक ही पुत्रा था, सर्वनाश हो गया। अब नाच लो डी.जे. बजाकर। परमात्मा की भक्ति करने से ऐसे संकट टल जाते हैं। इसलिए मेरे (रामपाल दास के) अनुयाईयों को सख्त आदेश है कि परमात्मा से डरकर कार्य करो। सामान्य विधि से विवाह करो। इस गंदे लोक (काल के लोक) में एक पल का विश्वास नहीं कि कब बिजली गिर जाए।

प्रश्न:- बारात का प्रचलन कैसे हुआ

उत्तर:- राजा लोगों से प्रारम्भ हुआ। वे लड़के के विवाह में सेना लेकर जाते थे। रास्ते में राजा की सुरक्षा के लिए सेना जाती थी। जिसका सब खर्च लड़की वाला राजा वहन करता था।

सेठ-साहूकार दहेज में अधिक आभूषण तथा धन देते थे। वे गाँव के अन्य गरीब वर्ग के व्यक्तियों को दिहाड़ी पर ले जाते थे जो सुरक्षा के लिए होते थे। उनको पहले दिन लड़के वाला अपने घर पर मिठाई खिलाता था। लड़की वाले से प्रत्येक रक्षक को एक चाँदी का रूपया तथा एक पीतल का गिलास दिलाया जाता था। जो गरीब वर्ग अपनी गाड़ी तथा बैल ले जाते थे, उनको कुछ अधिक राशि का प्रलोभन दिया जाता था। पहले जंगल अधिक होते थे। यातायात के साधन नहीं थे। इस प्रकार यह एक परम्परा बन गई। उस समय अकाल गिरते थे। लोग निर्धन होते थे। कोई धनी अकेला मिल जाता था तो उसको लूटना आम बात थी। इस कारण से बारात रूपी सेना का प्रचलन हुआ। फिर यह एक लोग-दिखावा परम्परा बन गई जिसकी अब बिल्कुल आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न:- भात तथा न्योंदा-न्यौंदार कैसे चला?

उत्तर:- उसका मूल भी बारात का आना, दहेज का देना। बारात ले जाने
के लिए लड़के वाले द्वारा मिठाई खिलाना। लड़की वाले के लिए भी उस बारात के लिए मिठाई तथा रूपया-गिलास देना आदि के कारण भात तथा न्यौता (न्योंदा) प्रथा प्रारम्भ हुई। न्योता समूह में गाँव तथा आसपास गवांड गाँव के प्रेमी-प्यारे व्यक्ति होते हैं। जिसके लड़के या लड़की का विवाह होता था तो अकेला परिवार खर्च वहन नहीं कर सकता था। उसके लिए लगभग सौ या अधिक सदस्य उस समूह में होते हैं। जिसके बच्चे का विवाह होता था तो सब सदस्य अपनी वित्तीय स्थिति अनुसार न्योता (धन राशि) विवाह वाले के पिता को देते हैं। कोई सौ रूपये, कोई दो सौ रूपये, कोई कम, कोई अधिक जो एक प्रकार का निःशुल्क उधार होता ै। उस पर ब्याज नहीं देना पड़ता। सबका न्योते का धन लिखा जाता है। प्रत्येक सदस्य की बही (डायरी) में प्रत्येक विवाह पर दिया न्योता लिखा होता है। इस प्रकार विवाह वाले परिवार को धन की समस्या नहीं आती है।

भात:- भात भी इसी कड़ी में भरा जाता है। बहन के बच्चों के विवाह में कुछ कपड़े तथा नकद धन देना (भाई द्वारा की गई सहायता) भात कहा जाता है जो धन बहन को लौटाना नहीं होता। जिन बहनों के भाई नहीं हैं, वे उस दिन अति दुःखी होती हैं, एकान्त में बैठकर रोती हैं।

पीलिया:- लड़की को संतान उत्पन्न होने पर मायके वालों की ओर से जच्चा के लिए घर का देशी शुद्ध घी, कुछ गौन्द (घी,आटा भूनकर, गोला, अजवायन, काली मिर्च का मिश्रण गौन्द कहलाता है), नवजात बच्चे के छोटे-छोटे कपड़े (झूगले) भी मायके वाले तथा लड़की की ननंदों द्वारा लाए जाते हैं। यह परंपरा है जो कपड़े एक वर्ष के पश्चात् व्यर्थ हो जाते हैं।

इस तरह की परंपरा को त्यागना है क्योंकि जीवन के सफर में व्यर्थ का भार है। आप अपनी बेटी की सहायता कर सकते हैं। जैसे गाय-भैंस लेनी है। बेटी की वित्तीय स्थिति कमजोर है तो उसको नकद रूपये दे सकते हैं, परंतु विवाह के समय नहीं। बेटी का आपकी संपत्ति में से हक दे सकते हैं, अगर बेटी लेना चाहे तो। बेटी को चाहिए कि आवश्यकता पड़ने पर धन ले ले, परंतु फिर लौटा दे। परमात्मा पर विश्वास रखे। आपका सम्मान बना रहेगा।

समाधान:- इन सबका समाधान है कि विवाह को सूक्ष्मवेद के अनुसार किया जाए। आप जी ने चार वेद सुने हैं:- यजुर्वेद,ऋग्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। परंतु पाँचवा वेद सूक्ष्म वेद है जो स्वयं पूर्ण ब्रह्म जी ने पृथ्वी पर प्रकट होकर अपने मुख कमल से अमृतवाणी द्वारा प्रदान किया है।

मेरे (रामपाल दास के) अनुयाई उसी पाँचवें वेद के अनुसार विवाह रस्म करते हैं जिसमें कोई उपरोक्त परम्परा की आवश्यकता नहीं पड़ती। विवाह पर तथा अन्य अवसरों लड़की-लड़के वाले पक्ष का कोई खर्च नहीं कराना होता। केवल कन्यादान यानि बेटी दान करना है। लड़की अपने पहनने के लिए केवल चार ड्रैस ले जा सकती है। जूता तो पहन ही रखा है, बस। जिस घर में जाएगी, वह परिवार उस बेटी को अपने घर के सदस्य की तरह रखेगा। अपने घर की वित्तीय स्थिति के अनुसार अन्य सदस्य के समान सर्व आवश्यक वस्तुऐं उपलब्ध कराएगा।

बेटी अपने माता-पिता, भाई-भाभी पर कोई भार नहीं बनेगी। जब कभी अपने मायके आएगी तो कोई सूट तथा नकद नहीं लेगी। जिस कारण से भाभी-भाई को भी प्यारी लगेगी। भाभी को ननंद इसीलिए खटकती है कि आ गई चार-पाँच हजार खर्च करवा कर जाएगी। परंतु हमारी बेटी सम्मान के साथ आएगी और सम्मान के साथ लौट जाएगी। अपने मायके वालों से कोई वस्तु नहीं लेगी। जिससे दोनों पक्षों का परस्पर अधिक प्रेम सदा बना रहेगा। भक्ति भी अच्छी होगी। इस प्रकार जीने की यथार्थ राह पर चलकर हम शीघ्र मंजिल पर (मोक्ष तक) पहुँचेंगे। प्रश्न:- जिनको संतान प्राप्त नहीं होती है, उस बेऔलादे (संतानहीन) का तो सुबह या शुभ कर्म को जाते समय मुख देखना भी बुरा मानते हैं ऐसा क्यों उत्तर:- यह संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान के टोटे के कारण गलत धारणा है। पाठकजन इसी पुस्तक के पृष्ठ 6 पर पढ़ें कि एक व्यक्ति के चार पुत्रा थे, उसको अधरंग हो गया तो किसी ने सेवा नहीं की। क्या उस आदमी के दर्शन इसलिए अच्छे हैं कि उसके संतान हैं। उसकी दुर्गति को कौन देखना अच्छा समझेगा

Written by
Ashwini Yadav

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