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द्वापरयुग में कविर्देव (कबीर साहेब) का करूणामय नाम से प्राकाट्य

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द्वापरयुग में कविर्देव (कबीर साहेब) का करूणामय नाम से प्राकाट्य

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परमेश्वर कबीर (कविर्देव) द्वापर युग में करूणामय नाम से प्रकट हुए थे। उस समय एक वाल्मीक जाति में उत्पन्न भक्त सुदर्शन सुपच (अनुसुचित जाति का) उनका शिष्य हुआ था। इसी सुदर्शन जी ने पाण्डवों की यज्ञ सफल की थी। जो न तो श्री कृष्ण जी के भोजन करने से सफल हुई थी, न ही तेतीस करोड़ देवताओं, अठासी हजार ऋषियों, बारह करोड़ ब्राह्मणों, नौ नाथों, चैरासी सिद्धों आदि के भोजन खाने से सफल हुई थी। भक्त सुदर्शन वाल्मीक पूर्ण गुरु जी से वास्तविक तीन मंत्र प्राप्त करके सत साधना गुरु मर्यादा में रहते हुए कर रहा था।

द्वापर युग में इन्द्रमति को शरण में लेना


द्वापरयुग में चन्द्रविजय नाम का एक राजा था। उसकी पत्नी इन्द्रमति बहुत ही धार्मिक प्रवृति की औरत थी। संत-महात्माओं का बहुत आदर किया करती थी। उसने एक गुरुदेव भी बना रखा था। उनके गुरुदेव ने बताया था कि बेटी साधु-संतों की सेवा करनी चाहिए। संतों को भोजन खिलाने से बहुत लाभ होता है। एकादशी का व्रत, मन्त्र के जाप आदि साधनायें जो गुरुदेव ने बताई थी, वह भगवत् भक्ति में बहुत दृढता से लगी हुई थी। गुरुदेव ने बताया था कि संतों को भोजन खिलाया करेगी तो तू आगे भी रानी बन जाएगी और तुझे स्वर्ग प्राप्ति होगी। रानी ने सोचा कि प्रतिदिन एक संत को भोजन अवश्य खिलाया करूँगी। उसने यह प्रतिज्ञा मन में ठान ली कि मैं खाना बाद में खाया करूँगी, पहले संत को खिलाया करूँगी। इससे मुझे याद बनी रहेगी। कहीं मुझे भूल न पड़ जाये। रानी प्रतिदिन पहले एक संत को भोजन खिलाती फिर स्वयं खाती। वर्षों तक ये क्रम चलता रहा।

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एक समय हरिद्वार में कुम्भ के मेले का संयोग हुआ। जितने भी त्रिगुण माया के उपासक संत थे सभी गंगा में स्नान के लिए (परभी लेने के लिए) प्रस्थान कर गये। इस कारण से कई दिन रानी को भोजन कराने के लिए कोई संत नहीं मिला। रानी इन्द्रमति ने भी प्रतिज्ञा वश स्वयं भी भोजन नहीं किया। चैथे दिन रानी इन्द्रमति ने अपनी बांदी से कहा कि बांदी देख ले कोई संत मिल जाए तो। नहीं तो आज तेरी रानी जीवित नहीं रहेगी। आज मेरे प्राण निकल जाएँगे परन्तु मैं खाना नहीं खाऊँगी। वह दीन दयाल कबीर परमेश्वर अपने पूर्व वाले भक्त को शरण में लेने के लिए न जाने क्या कारण बना देता है ?
बांदी ने ऊपर अटारी पर चढ़कर देखा कि सामने से एक संत आ रहा था। सफेद कपड़े थे। द्वापर युग में परमेश्वर कबीर करूणामय नाम से आये थे। बांदी नीचे आई और रानी से कहा कि एक व्यक्ति है जो साधु जैसा नजर आता है।
रानी ने कहा कि जल्दी से बुला ला।
बांदी महल से बाहर गई तथा प्रार्थना की कि
 हे महात्मा जी! आपको हमारी रानी ने याद किया है।
करूणामय साहेब ने कहा कि रानी ने मुझे क्यों याद किया है, मेरा और रानी का क्या सम्बन्ध?
 नौकरानी ने सारी बात बताई।
करूणामय (कबीर) साहेब ने कहा कि
रानी को आवश्यकता पड़े तो यहाँ आ जाए, मैं यहाँ खड़ा हूँ। तू बांदी और वह रानी। मैं वहाँ जाऊँ और यदि वह कह दे कि तुझे किसने बुलाया था या उसका राजा ही कुछ कह दे और बेटी संतों का अनादर बहुत पापदायक होता है।

बांदी फिर वापिस आई और रानी से सब वार्ता कह सुनाई। तब रानी ने कहा कि बांदी मेरा हाथ पकड़ और चल। जाते ही रानी ने दण्डवत् प्रणाम करके प्रार्थना की कि

 हे परवरदिगार! चाहती तो हूँ कि आपको कंधे पर बैठा लूं। करूणामय साहेब ने कहा बेटी ! मैं यही देखना चाहता था कि तेरे में कोई श्रद्धा भी है या वैसे ही भूखी मर रही है। रानी ने अपने हाथों खाना बनाया। करूणामय रूप में आए कविर्देव ने कहा कि मैं खाना नहीं खाता। मेरा शरीर खाना खाने का नहीं है। तो रानी ने कहा कि मैं भी खाना नहीं खाऊँगी। करूणामय साहेब जी ने कहा कि ठीक है बेटी लाओ खाना खाते हैं,

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क्योंकि समर्थ उसी को कहते हंै जो, जो चाहे, सो करे।

करूणामय साहेब ने खाना खा लिया, करूणामय रूप में प्रकट कविरग्नि (कबीर परमेश्वर) ने रानी से पूछा कि
जो यह तू साधना कर रही है यह तेरे को किसने बताई है?
रानी ने कहा कि मेरे गुरुदेव ने आदेश दिया है?
कबीर साहेब ने पूछा क्या आदेश दिया है तेरे गुरुदेव ने?
इन्द्रमती ने कहा कि ब्रह्मा-विष्णु-महेश की पूजा, एकादशी का व्रत, तीर्थ भ्रमण, देवी पूजा, श्राद्ध निकालना, मन्दिर में जाना, संतों की सेवा करना।

करूणामय (कबीर) साहेब ने कहा कि
जो साधना तेरे गुरुदेव ने दी है तेरे को जन्म और मृत्यु तथा स्वर्ग-नरक के चक्र में रखेगी व चैरासी लाख योनियों के कष्ट से मुक्त नहीं होने देगी।
रानी ने कहा कि महाराज जी जितने भी संत हैं, अपनी-अपनी प्रभुता आप ही बनाने आते हैं। मेरे गुरुदेव के बारे में कुछ नहीं कहोगे। मैं चाहे मुक्त होऊँ या न होऊँ।

अब करूणामय (कबीर) साहेब सोचते हैं कि इस भोले जीव को कैसे समझाए? इन्होंने जो पूछ पकड़ ली उसको छोड़ नहीं सकते, मर सकते हैं।
करूणामय साहेब ने कहा कि बेटी वैसे तो तेरी ईच्छा है, मैं निंदा नहीं कर रहा। क्या मैंने आपके गुरुदेव को गाली दी है या कोई बुरा कहा है? मैं तो भक्तिमार्ग बता रहा हूँ कि यह भक्ति शास्त्रा विरूद्ध है। तुझे पार नहीं होने देगी और न ही तेरा कोई आने वाला कर्म दण्ड कटेगा और सुन ले आज से तीसरे दिन तेरी मृत्यु हो जाएगी। न तेरा गुरु बचा सकेगा और न तेरी यह नकली साधना बचा सकेगी।

(जब मरने की बारी आती है फिर जीव को डर लगता है। वैसे तो नहीं मानते)

रानी ने सोचा कि संत झूठ नहीं बोलते। कहीं ऐसा न हो कि मैं परसों ही मर जाऊँ। इस डर से करूणामय साहेब से पूछा कि साहेब क्या मेरी जान बच सकती है?
कबीर साहेब (करूणामय) ने कहा कि बच सकती है। अगर तू मेरे से उपदेश लेगी, मेरी शिष्या बनेगी, पिछली पूजाएँ त्यागेगी, तब तेरी जान बचेगी।
इन्द्रमति ने कहा मैंने सुना है कि गुरुदेव नहीं बदलना चाहिए, पाप लगता है।
 कबीर साहेब (करूणामय) ने कहा कि नहीं पुत्राी यह भी तेरा भ्रम है। एक वैद्य (डाक्टर) से दवाई न लगे तो क्या दूसरे से नहीं लेते? एक पाँचवीं कक्षा का अध्यापक होता है। फिर एक उच्च कक्षा का अध्यापक होता है। बेटी अगली कक्षा में जाना होगा। क्या सारी उम्र पाँचवीं कक्षा में ही लगी रहेगी। इसको छोड़ना पड़ेगा। तू अब आगे की पड़ाई पढ़, मैं पढाने आया हूँ।

वैसे तो नहीं मानती परन्तु मृत्यु दिखने लगी कि संत कह रहा है तो कहीं बात न बिगड़ जाए। ऐसा विचार करके इन्द्रमति ने कहा कि जैसे आप कहोगे मैं वैसे ही करूँगी।
करूणामय (कबीर) साहेब ने उपदेश दिया। कहा कि तीसरे दिन मेरे रूप में काल आयेगा, तू उससे बोलना मत। जो मैंने नाम दिया है दो मिनट तक इसका जाप करना। दो मिनट के बाद उसको देखना है। उसके बाद सत्कार करना है। वैसे तो गुरुदेव आए तो अति शीघ्र चरणों में गिर जाना चाहिए। ये मेरा केवल इस बार आदेश है। रानी ने कहा ठीक है जी।

अब रानी को तो चिंता बनी हुई थी। श्रद्धा से जाप कर रही थी। (कबीर साहेब) करूणामय साहेब का रूप बना कर गुरुदेव रूप में काल आया, आवाज लगाई इन्द्रमति, इन्द्रमति। अब उसको तो पहले ही डर था, नाम स्मरण किया। काल की तरफ नहीं देखा। दो मिनट के बाद जब देखा तो काल का स्वरूप बदल गया। काल का ज्यों का त्यों चेहरा दिखाई देने लगा। करूणामय साहेब का स्वरूप नहीं रहा।

जब काल ने देखा कि तेरा तो स्वरूप बदल गया। वह जान गया कि इसके पास कोई शक्ति युक्त मंत्रा है। यह कहकर चला गया कि तुझे फिर देखूँगा। अब तो बच गई। रानी बहुत खुश हुई, फूली नहीं समाई। कभी अपनी बांदियों को कहने लगी कि मेरी मृत्यु होनी थी, मेरे गुरुदेव ने मुझे बचा दिया।
राजा के पास गई तथा कहा कि आज मेरी मृत्यु होनी थी, मेरे गुरुदेव ने रक्षा कर दी। मुझे लेने के लिए काल आया था।
राजा ने कहा कि तू ऐसे ही डंामें करती रहती है। काल आता तो क्या तुझे छोड़ जाता? ये संत वैसे बहका देते हैं।
राजा की बात को रानी कैसे माने? खुशी-खुशी में रानी अपने कक्ष मंे जाकर लेट गई। कुछ देर के बाद सर्प बनकर काल फिर आया और रानी को डस लिया। ज्यों ही सर्प ने डसा रानी को पता चल गया। रानी जोर से चिल्लाई।
मुझे साँप ने डंस लिया। नौकर भागे। देखते ही देखते एक मोरी (पानी निकलने का छोटा छिद्र) में से वह सर्प निकल गया। अपने गुरुदेव को पुकार कर रानी बेहोश हो गई। करूणामय (कबीर) साहेब वहाँ प्रकट हो गए। लोगों को दिखाने के लिए मंत्र बोला।
 (वे तो बिना मंत्र भी जीवित कर सकते हैं, किसी जंत्र-मंत्र की आवश्यकता नहीं)
इन्द्रमती को जीवित कर दिया।
रानी ने बड़ा शुक्र मनाया कि हे बंदी छोड़ यदि आज आपकी शरण में नहीं होती तो मेरी मृत्यु हो जाती। कबीर परमेश्वर ने कहा कि ईन्द्रमति इस काल को मैं तेरे घर में घुसने भी नहीं देता। तेरे पर यह हमला भी नहीं करता। परन्तु तुझे विश्वास नहीं होता। तू यह सोचती कि मेरे ऊपर कोई आपत्ति नहीं आनी थी। गुरुजी ने मुझे बहका कर नाम दे दिया। इसलिए तेरे को थोड़ा-सा झटका दिखाया है। नहीं तो बेटी तेरे को विश्वास नहीं होता।

धर्मदास यहाँ घना अंधेरा, बिन परचय जीव जम का चेरा।।

कबीर साहेब (करूणामय)ने कहा कि अब जब मैं चाहूँगा, तब तेरी मृत्यु होगी।

गरीबदास जी कहते हैं कि:-

गरीब, काल डरै करतार से, जय जय जय जगदीश।
जौरा जौरी झाड़ती, पग रज डारे शीश।।

यह काल, कबीर भगवान (कबीर परमेश्वर)से डरता है और यह मौत कबीर साहेब के जूते झाड़ती है अर्थात् नौकर तुल्य है। फिर उस धूल को अपने सिर पर लगाकर कहती है कि आप के भक्त के पास मैं नहीं जाऊँगी।

गरीब, काल जो पीसै पीसना, जौरा है पनिहार ।
ये दो असल मजूर हैं, मेरे साहेब के दरबार।।

यह काल जो यहाँ का 21 ब्रह्मण्ड का भगवान (ब्रह्म)है तथा जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश का पिता है। ये तो मेरे कबीर साहेब का आटा पीसता है अर्थात पक्का नौकर है और जौरा (मौत)मेरे कबीर परमेश्वर का पानी भरती है अर्थात् एक विशेष नौकरानी है। यह दो असल मजदूर मेरे कबीर परमेश्वर के दरबार में है। कुछ दिनों के बाद साहेब फिर आए। रानी इन्द्रमति को सतनाम प्रदान किया।

फिर कुछ समय के उपरान्त करूणामय साहेब ने रानी इन्द्रमति की अति श्रद्धा देखकर सारनाम दिया। शब्द की उपलब्धि करवाई। कबीर परमेश्वर रानी इन्द्रमति को समय-2 पर दर्शन देने जाते रहते थे तो इन्द्रमति प्रार्थना किया करती थी कि मेरे पति राजा को समझाओ मालिक, यह भी मान जाये। आपके चरणों में आ जाये तो मेरा जीवन सफल हो जाये।
चन्द्रविजय से कबीर साहेब ने प्रार्थना की कि चन्द्रविजय आप भी नाम लो, यह दो दिन का राज और ठाठ है। फिर चैरासी लाख योनियों में प्राणी चला जाएगा।
चन्द्रविजय ने कहा कि भगवन मैं तो नाम लूं नहीं और आपकी शिष्या को मना करूँ नहीं, चाहे सारे खजाने को ही दान करो, चाहे किसी प्रकार का सत्संग करवाओ, मैं मना नहीं करूँगा।
 कबीर साहेब (करूणामय)ने पूछा आप नाम क्यों नहीं लोगे?
 चन्द्रविजय राजा ने कहा कि मैंने तो बड़े-बड़े राजाओं की पार्टियों में जाना पड़ता है।
करूणामय (कबीर साहेब)ने कहा कि पार्टियों में जाने में नाम क्या बाधा करेगा? सभा में जाओ, वहाँ काजू खाओ, दूध पी लो, शरबत(जूस)पी लो, शराब मत प्रयोग करो। शराब पीना महापाप है। परन्तु राजा नहीं माना।

रानी की प्रार्थना पर करूणामय (कबीर) साहेब ने राजा को फिर समझाया कि नाम के बिना ये जीवन ऐसे ही व्यर्थ हो जायेगा। आप नाम ले लो।
राजा ने फिर कहा कि गुरू जी मुझे नाम के लिए मत कहना। आपकी शिष्या को मैं मना नहीं करूँगा। चाहे कितना दान करे, कितना सत्संग करवाए।
साहेब ने कहा कि बेटी इस दो दिन के सुख को देखकर इसकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है। तू प्रभु के चरणों में लगी रह। अपना आत्मकल्याण करवा। यहाँ कोई किसी का पति नहीं, कोई किसी की पत्नी नहीं। पूर्व जन्म के संस्कार से दो दिन का सम्बन्ध है। अपना कर्म बना बेटी।

अब इन्द्रमति 80 वर्ष की बुढिया हो गई है, कहाँ 40 साल की उम्र में मर जाना था। जब शरीर भी हिलने लगा, तब करूणामय साहेब बोले अब बोल इन्द्रमति क्या चाहती है? चलना चाहती है सतलोक?
 इन्द्रमति ने कहा कि परमेश्वर मैं तैयार हूँ। बिल्कुल तैयार हूँ दाता।
करूणामय साहेब ने कहा कि तेरी पोते या पोती में कोई ममता तो नहीं है?
रानी ने कहा बिल्कुल नहीं परमेश्वर। आपने ज्ञान ही ऐसा निर्मल दे दिया। इस गंदे लोक की क्या इच्छा करूँ?
कबीर (करूणामय) परमेश्वर जी ने कहा कि चल बेटी।

रानी प्राण त्याग गई। परमेश्वर कबीर (करूणामय) बन्दी छोड़ रानी इन्द्रमति की आत्मा को ऊपर ले गए। इसी ब्रह्मण्ड में एक मानसरोवर है। उस मान सरोवर पर जाकर इस आत्मा को स्नान कराना होता है। इस प्राणी को कबीर परमेश्वर पूरे गुरु के स्वरूप में प्रकट होकर कुछ समय तक मानसरोवर पर रखते हैं।
परमेश्वर कबीर बन्दी छोड़ जी ने इन्द्रमति से फिर पूछा इस संसार में तेरी कुछ इच्छा हो तो दुबारा जन्म लेना पड़ेगा। यदि मन में इच्छा रह गई तो सतलोक नहीं जा सकती।
इन्द्रमति ने कहा साहेब आप तो अंतर्यामी हो, कोई इच्छा नहीं है। आपके चरणों की इच्छा है। लेकिन एक मन में शंका बनी हुई है कि मेरा जो पति था, उसने मुझे किसी भी धार्मिक कर्म के लिए कभी मना नहीं किया। नहीं तो आजकल के पति अपनी पत्नियों को बाधा कर देते हैं। यदि वह मुझे मना कर देता तो मंै आपके चरणों में नहीं लग पाती। मेरा कल्याण नहीं होता। उसका इस शुभ कर्म में सहयोग का कुछ लाभ मिलता हो तो कभी उस पर भी दया करना दाता।
परमेश्वर कबीर जी ने देखा कि यह नादान इसके पीछे फिर लटक गई। साहेब बोले ठीक है बेटी, अभी तू दो चार वर्ष यहाँ रह।

दो वर्ष पश्चात् राजा भी मरने लगा। क्योंकि नाम ले नहीं रखा था। यम के दूत आए। राजा चौक में चक्कर खाकर गिर गया। यम के दूतों ने उसकी गर्दन को दबाया। राजा की टट्टी और पेशाब निकल गया।
 करूणायम (कबीर) साहेब ने रानी को कहा कि देख तेरे राजा की क्या हालत हो रही है?
वहाँ मानसरोवर से परमेश्वर कबीर जी ने दिखाया।
यह सर्व कौतुक देखकर रानी ने कहा कि देख लो दाता यदि उसका भक्ति में सहयोग का कोई फल बनता हो तो दया कर लो। रानी को फिर भी थोड़ी-सी ममता बनी थी। साहेब कबीर (करूणामय) ने सोचा की यह फिर काल जाल में फंसेगी। यह सोचकर मानसरोवर से वहाँ गए जहाँ राजा चन्द्रविजय अपने महल में अचेत पड़ा था। यमदूत उसके प्राण निकाल रहे थे। कबीर साहेब के आते ही यमदूत ऐसे आकाश में उड़ गए जैसे मुर्दे से गिद्ध उड़ जाते हैं। चन्द्रविजय होश में आ गया। सामने करूणामय साहेब खड़े थे। केवल चन्द्रविजय को दिखाई दे रहे थे, किसी अन्य को दिखाई नहीं दे रहे थे।
चन्द्रविजय चरणों में गिर कर याचना करने लगा मुझे क्षमा कर दो दाता, मेरी जान बचाओ।
क्योंकि अब उसने देखा कि तेरी जान जाने वाली है। (जब इस जीव की आँख खुलती है कि यह तो बात बिगड़ गई) मुझे क्षमा कर दो दाता, मेरी जान बचा लो मालिक।
कबीर साहेब ने कहा राजा आज भी वही बात है, उस दिन भी वही बात थी, नाम लेना होगा। राजा ने कहा मैं नाम ले लूँगा जी, अभी ले लूँगा नाम। कबीर साहेब ने नाम उपदेश दिया तथा कहा कि अब मैं तुझे दो वर्ष की आयु दूँगा, यदि इसमें एक स्वांस भी खाली चला गया तो फिर कर्मदण्ड रह जाएगा।

कबीर, जीवन तो थोड़ा भला, जै सत सुमरण हो। 
लाख वर्ष का जीवना, लेखे धरे ना को।।

शुभ कर्म में सहयोग दिया हुआ पिछला कर्म और साथ में श्रद्धा से दो वर्ष के स्मरण से तथा तीनों नाम प्रदान करके कबीर साहेब चन्द्रविजय को भी पार कर ले गये।

बोलो (कबीर परमेश्वर) कविर्देव की जय।

‘‘जय बन्दी छोड़‘‘

परमेश्वर कबीर जी सच्चे श्रद्धालु की आयु बढ़ा देता है तथा उसके परिवार की भी रक्षा करता है, उपरोक्त विवरण से सिद्ध हुआ। यह प्रमाण बहुत पहले के हैं। वर्तमान में साधारण व्यक्ति विश्वास नहीं करता। वर्तमान में पूज्य कबीर परमेश्वर की शक्ति से सतगुरु रामपाल जी के द्वारा हुए कष्ट निवार्ण तथा आयु वृद्धि के ढेर सारे प्रमाण पढ़ें इसी पुस्तक में ‘भटकों को मार्ग विषय‘ नामक लेख में।

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LORD KABIR

 


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