BKPK VIDEO शेख फरीद (बाबा फरीद) की कथा | Story And Fact About Baba Sheikh Farid in Hindi | BKPK VIDEO

शेख फरीद (बाबा फरीद) की कथा | Story And Fact About Baba Sheikh Farid in Hindi | BKPK VIDEO

Summary:

Baba Farid, or Baba Sheikh Farid, or Khwaja Farīduddīn Mas’ūd Ganjshakar was a Sufi preacher and one of the most significant saints in Punjab during the 12th century.

Story And Fact About Baba Sheikh Farid in Hindi

एक शेख फरीद नाम के मुसलमान संत थे, भक्त थे। वो बचपन में काफी शरारती थे । और उसकी माता जी प्रतिदिन नमाज़ करने को कहती थी, वो नहीं करता था, मानता नहीं था। वो कहता था कि मुझे अल्लाह से क्या मिलेगा? मैं क्यों करूँ नमाज़? एक दिन माँ ने कहा कि अल्लाह तुझे खजूर देगा। अब शेख फरीद जी को खजूर बहुत प्रिय थे। वो उसका मनपसंद फल था। वह कहने लगा – सचमुच। माँ ने कहा – हाँ। शेख फरीद ने कहा कि देख लो, अगर अल्लाह ने खजूर नहीं दिए तो मैं कभी नमाज़ नहीं करूँगा।  माता ने कहा –अवश्य देगा बेटा। वो यह चाहती थी कि ये किसी तरह शरारत से पीछा छोड़ दे, नमाज़ तो इसे क्या करनी आएगी। और मैं अपने काम कर लिया करुँगी। बहुत उलाहने आते हैं।

माता ने क्या किया कि एक चद्दर बिछाई, और कहा कि बेटा, जब तक मैं न कहूँ तब तक आँख नहीं खोलनी । और ऐसे विधि बता दी कि ऐसे लेट कर मत्था टेकना है। शेख फरीद ने कहा कि क्या कहूँ माँ ? माता ने कहा कि ये कहता रहियो कि – अल्लाह मुझे खजूर दे, अल्लाह मुझे खजूर दे। शेख फरीद यही करता रहा – अल्लाह मुझे खजूर दे। माँ अपने काम में लग गयी। उसकी माँ ने क्या किया कि थोड़े से खजूर ला कर, 4-5 खजूर एक पत्ते में लपेट कर जहाँ वो चद्दर बिछा राखी थी, उसके नीचे रख दिए। जब माँ का काम हो लिया तो उसने कहा कि बेटा अब उठ ले। माँ ने सोचा की अब यह कोई शरारत करेगा तो मैं इसे पकड़ लाऊंगी, बिठा लुंगी। शेख फरीद उठा, उसने देखा कि कहीं खजूर तो है ही नहीं। तो वो चल पड़ा और कहने लगा कि माँ तू तो बहुत झूठी है। आप कह रहे थे कि अल्लाह तुझे खजूर देगा। पर अल्लाह ने तो खजूर नहीं दिए। अब आज के बाद मैं कभी नहीं करूँगा नमाज़। माँ बोली बेटा, अल्लाह ऐसे सबके समक्ष थोड़े ही न दिया करता है। वो तो गुप्त रूप से दिया करता है। जिस कपडे के नीचे तू नमाज़ कर रहा था, देख उसको उठा कर। उसने उठा कर देखा कि एक पत्ते के अंदर 4-5 खजूर थे। वो उन्हें खाए और कूदे। 

जब शेख फरीद ने खजूर खा लिए तो थोड़ी देर बाद बोला कि माँ अब बता नमाज़ कब करनी है। नमाज़ पांच समय करनी होती है। तो माँ क्या करती थी कि जब वो व्यस्त हो जाता था आँखे बंद करके कहने में कि अल्लाह मुझे खजूर दे, तो माँ चुपके से वो खजूर रख आती थी। एक दिन वो काम में लग गयी और खजूर रखना भूल गयी। तो शेख फरीद उठा, उसने चद्दर उठा कर देखी, वहां उसी प्रकार खजूर पड़े थे। वो खजूर खाता हुआ आ रहा था। अब उसकी माँ को याद आया कि आज मैं खजूर रखना भूल गयी, और यह आ गया। और यह निकम्मा कभी नमाज़ नहीं करेगा। हे भगवान, यह आज क्या बनी, मैं कैसे भूल गयी। शेख फरीद खजूर खता हुआ आ रहा था। उसकी माँ ने कहा कि बेटा, यह खजूर कहा से लाया तू? शेख फरीद बोला – अरे माँ, अल्लाह रोज़ ही तो देता है! माँ ने सोचा यह निकम्मा आप लाया है कहीं से। उसने कहा कि सच बता तू कहाँ से लाया है? शेख फरीद ने कहा कि माँ देख यहीं तो पड़े थे, मैं कहीं बाहर तो गया ही नहीं। 

अब उसकी माँ के पसीने आ गए कि सचमुच ये तो परमात्मा ने बहुत ही सुन्दर और स्वादिष्ट खजूर भेज दिए। अब यह लक्षण हैं क्योंकि वो पिछले जन्म का संस्कारी हंस था। और ऐसे हंस के लिए पूर्ण ब्रह्म परमात्मा साथ-साथ फिरते हैं। कहते हैं :-

जो जन हमरी शरण है, ताका हूँ मैं दास।

गेल-गेल लाग्या रहूँ, जब तक धरती आकाश।। 

– कबीर साहेब

उसी बालक शेख फरीद ने बड़ा हो कर के घर त्याग दिया। क्योंकि जिनको भगवान की चाह है वो तड़फ जाते हैं जब तक उनको यथार्थ भक्ति मार्ग नहीं मिलता। तो उसने जा कर के एक सूफी संत यानी तपस्वी संत को गुरु बना लिया। अब उस तपस्वी को जैसा ज्ञान था उसने उसको कहा कि बेटा, तप से अल्लाह का दीदार होगा, परमात्मा के दर्शन होंगे। और जितना घोर तप आप कर सकते हो करो। उसने विधि बता दी। शेख फरीद वैसा करने लगा। 

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आश्रम में जहाँ वो रहते थे, वहां पांच-सात और भी शिष्य थे उस गुरु के। उन्होंने क्या कर रखा था कि प्रतिदिन एक शिष्य की सेवा बाँट रखी थी कि एक दिन एक ही व्यक्ति, एक ही सेवक खाना भी बनाएगा गुरु जी का, और वस्त्र भी धोएगा, और गुरु जी का हुक्का भी भरेगा। शेख फरीद का गुरु हुक्का पीया करता था। शेख फरीद के प्रति उस गुरुदेव का काफी रुझान था। वो शेख फरीद को अत्यधिक विश्वसनीय मानता था। और उसको सेवा में अधिक रखता था। तो अन्य शिष्य ईर्ष्या करने लग गए कि गुरु जी शेख फरीद से ज्यादा लगाव रखते हैं। और हमसे इतना प्रेम नहीं करते। ऐसा कोई तरीका ढूंढो कि ये गुरु जी की नज़रों में गिर जाय। 

Special: ये आग सब जगह लगी है। जहाँ परमात्मा का वास नहीं होता वहां यह बिमारी सब डेरों में घर कर जाती है। परन्तु जहाँ पूर्ण परमात्मा का वास होता है, पंजा होता है, वहां ऐसी घटनाएँ जल्दी से नहीं घटती। परमात्मा कोई न कोई कारण बनाकर उनको सीधा कर देता है।

 तो वहां क्या हुआ कि एक दिन शेख फरीद की सेवा का दिन आ गया। उसने शाम के समय खाना बनाया। और खाना बना कर जब खिलाने के लिए गया, उसके बाद हुक्का भरने के लिए अग्नि तैयार करनी होती है। वो तैयार करके गया। उन चेलों ने क्या सोचा कि यह जो हुक्का भरने के लिए अग्नि होती है, इस पर पानी डाल दो। ये बुझ जायेगी। और वो गुरु जी इतना क्रोधी था कि खाना खाते ही दस मिनट के अंदर उसको हुक्का चाहिए। अगर दस मिनट में हुक्का नहीं आता, तो डंडा उठा कर बिना गिनती के उस सेवक के मार दिया करता। इतना पीट देता था और उस सेवक को सेवा से वंचित कर देता था। तो उन्होंने सही तरीका ढूँढा कि आज ये समय से हुक्का नहीं भर पायेगा और ये गुरु-चेले की यारी टूटेगी। 

अब शेख फरीद खाना खिलने गया। वो तो निश्चिन्त था की दो मिनट में हुक्का भर के दे दूंगा। अग्नि तैयार कर रखी है। उसने गुरु जी को खाना खिलाया और फिर बर्तन रख कर आया। तो धीरे-धीरे आ कर के ज्यों ही वो अग्नि के पास पहुंचा जहाँ चिलम रखी थी, तो उसने देखा कि आग तो बुझ गयी। उन दिनों वर्षा के दिन थे। उसने सोचा गीली लकड़ी थी बुझ गयी होगी। वहां से आधा किलोमीटर की दूरी पर गाँव था। अब उसने आव देखा न ताव। हाथ में चिलम ले ली, तम्बाकू डाल लिया और दौड़ लिया। 

वहाँ देखा कि एक घर से धुँआ उठ रहा था। भाग कर उसमें घुस गया और बोला कि –माई, अग्नि दे दे। माई की बेटी, अग्नि दे दे। अब वो माई खुद दुखी हो रही थी। फूक मारे, आग बाले, आग बले नहीं, धुँआ उठे, आँखों में पानी आए। वो गुस्से में आकर बोली – क्यों सिर पर चढ़ता आवे है। आँख फूटे है आग में। तू आँख फुड़वा ले। तब आग मिलेगी। ऐसे थोड़े ही न मिलती है आग। शेख फरीद ने कहा कि माई, आँख फोड़ने से आग मिल जाएगी? माई ने कहा -हाँ, आँख फ़ुड़वा ले, तब मिलेगी आग। वो उसकी तरफ देख नहीं रही थी और फूँ-फूँ कर रही थी। शेख फरीद ने क्या किया कि चिमटा दे कर आँख में और आँख निकाल दी। उसको ये था कि यदि आज गुरु जी रुष्ट हो गए, तो तेरी करी करायी कमाई जाएगी। उसने निकाल के आँख और कहा कि -ले माई, आँख ले ले, मुझे आग दे दे। अब माई ने देखा कि इसने तो सचमुच आँख निकाल दी। वो डर गयी कि सुना है जिसका ये शिष्य है वो साधू बहुत सिद्ध है और उसके वचन सिद्ध होते हैं। वो डर गई, और बोली – महाराज, ले लो आग। 

अब शेख फरीद ने उस फूटी आँख के ऊपर कपड़ा बाँध लिया। और फटा-फट आग रख कर भाग लिया। अब गुरु जी ने पहली आवाज़ लगायी थी कि भाई शेख फरीद, हुक्का ला बेटा। वो भी उसने सुन ली दूर से। अगर दूसरे-तीसरे पर वो न पहुँचता तो, गुरु जी के हाथ में डंडा होता। वो भगा आ रहा था। आँख निकाल रखी थी। पीड़ा असहनीय हो रही थी। लेकिन वो भक्त चसक भी नहीं रहा था। और भाग लिया। जब दूसरी आवाज़ लगाई, तो भी दूर था। जब तीसरी आवाज़ लगाई के शेख फरीद कहाँ मर गया तू। तो शेख फरीद बोला –आ गया गुरु जी, आ गया गुरु जी, आ गया गुरु जी, आ गया। वो पहुँच गया। गुरु जी बोले – क्या हो गया था बेटा? शेख फरीद बोला – गुरु जी वर्षा के दिन हैं, और आग बनी नहीं। यहाँ नगरी से जाकर लाया हूँ। गुरु जी बोले – अच्छा बेटा। तेरी आँख को क्या हो गया? शेख फरीद बोला – बस जी, आपकी दया है जी। कुछ नहीं हुआ जी। भागा जा रहा था और एक झाड़ी लग गयी और खरोंच सी आ गयी। इसलिए बाँध ली। गुरु जी बोले – अच्छा बेटा। कोई दवाई लगा ले। अब वो गुरु जी तो पी के हुक्का सो गया। 

उस माई को नींद नहीं आई कि – हे भगवान, ये क्या हुआ। कैसा पाप हो गया मेरे से। उसने एक डब्बे में रख रखी थी वो आँख छुपा के। उसने सोचा कि अभी रात को तो जा नहीं सकती, सुबह जाऊंगी। सुबह वो उस आँख को ले कर गई और कहा कि महाराज जी, मुझे माफ़ कर दो, मेरे से गलती हो गयी। संत बोला – क्या हो गया बेटी? माई बोली – माफ़ कर दो महाराज, मेरे से बहुत बड़ी गलती हो गयी। ऐसे-ऐसे आपका भक्त अग्नि लेने गया था, और मैं धूंए में दुखी हो रही थी। मौसम गीला था। जिसकी वजह से लकड़ी भी ठीक से नहीं जल रही थी, और फूंक मार मारकर मेरी आँखें धुँयें से खराब हो रही थीं, और मैंने ऐसे-ऐसे कह दिया, और आपके शिष्य ने सच में आँख निकाल कर रख दी। हे गुरु जी, मुझे माफ़ कर दो। मुझे पाप लग गया। मैंने तो वैसे ही कहा था। 

उस संत ने सोचा कि ये तो गजब हो गया। उसने बोला कि शेख फरीद कहाँ है? उसे बुलाओ। शेख फरीद आ गया। उसने देख लिया कि माई आ गयी, ये तो बात बिगाड़ दी। संत बोला – बेटा, क्या हो गया तेरी आँख को? शेख फरीद बोला – कुछ नहीं, गुरु जी। आप बैठे हो, दास को क्या हो सकता है। गुरु जी ने कहा – खोल इस कपड़े को। वो कपड़ा खोला तो आँख ज्यों की त्यों पाई। लेकिन थोड़ी छोटी हो गयी पहले वाली से। और वो माई अलग से एक आँख ले रही थी। 

Fact: तत्वज्ञान से ये बताना चाहते हैं की शेख फरीद के वो गुरुदेव इतने सिद्ध पुरुष थे कि उनकी शक्ति से वो आँख भी पूरी हो गयी फूटी हुई, पर मोक्ष फिर भी नहीं था। 

कुछ दिनों के बाद उस संत का देहांत हो गया। शेख फरीद ने सोचा कि गुरु जी ने कहा है की तप करने से परमात्मा के दर्शन हो सकते हैं। अगर इस मानव जीवन से परमात्मा प्राप्ति नहीं हुई, तो यह व्यर्थ है। ऐसा सोच कर जैसे उसके गुरुदेव ने बताया था वो वैसे साधना करता रहा। पहले बैठ कर किया, फिर खड़ा हो कर किया। उसने सोचा कि भाई ऐसे तो बात नहीं बनेगी। एक दिन उसने कुएँ में उल्टा लटक कर तप करने की सोची। वह एक वृक्ष की मोटी डार से अपने पैर बाँध कर कुँए के अंदर उल्टा लटक जाता और पानी के स्तर के ऊपर रह कर घंटों तप करता रहता। बीच बीच में थोड़ा सा अन्न खाता। बहुत कमज़ोर हो गया। 

कहते हैं कि 12 वर्ष में शेख फरीद ने सवा मण यानी 50 किलो अन्न खाया था। तो एक दिन में कितना खाया होगा, हिसाब लगा लो। उसके शरीर में केवल अस्थि पिंजर शेष था। एक दिन वो कुँए से बाहर आकर लेटा हुआ था और बहुत घबराया हुआ था कि हे भगवान, यह शरीर भी जायेगा और दर्शन परमात्मा के हुए नहीं। वो ऐसे लेटा हुआ था और कौअे आ गए और उन्होंने सोचा कि ये आदमी मरा हुआ है। उसके शरीर पर और तो कहीं मांस था नहीं, क्योंकि वो बिलकुल सूख चूका था लकड़ी की तरह। कमज़ोर इतना हो गया था। कौओं ने सोचा कि इसकी आँख खा लो थोड़ी बहुत गीली होंगी। तो उसके माथे पर कौअे आ कर बैठ गए। जैसे ही कौअे आये तो शेख फरीद कहने लगा, भाई कौओं मेरी आँख न फोड़ो। मेरी आँख छोड़ दो। अगर मेरे शरीर पर कहीं माँस बचा हो तो उसको सारे को खा लो। मेरी आँख न खाओ। हो सकता है मुझे अल्लाह के दर्शन हो जाएँ। जब वो इतना बोला तो कौअे उड़ गए कि ये आदमी तो जिन्दा है। 

अब उसने सोचा कि यहाँ तो ये कौअे तेरी आँख फोड़ेंगे और भगवान के दर्शन होंगे नहीं। ऐसा सोच कर वो वापिस कुएँ में लटक गया। ऐसे वो एक बार कुँए से बाहर आता था, थोड़ा सा भोजन करता था और फिर वापिस लटक जाता था। ऐसे वो एक दिन लटका हुआ था और फूट-फूट कर रोने लग गया कि हे परमात्मा, जीवन बर्बाद हो गया, आपके दर्शन हुए नहीं। अब यह पुण्य आत्मा पहले कभी परमेश्वर की शरण में रही थी। जब परमात्मा ने देखा कि यह हृदय से रो रहा है, फूट-फूट कर रो रहा है कि जीवन नाश हो गया। तो परमात्मा कबीर भगवान, अल्लाहु अकबर, सतलोक से आये और शेख फरीद को कुँए से बाहर निकल लिया।

जब शेख फरीद बाहर आया तो बोला -भाई, क्यों मुझे परेशान कर रहे हो। मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है। मैं अपना काम कर रहा हूँ, तुम अपना करो। कबीर साहिब ने कहा कि तुम कुँए में क्या कर रहे हो। शेख फरीद ने कहा कि मैं अल्लाह के दीदार कर प्रयत्न कर रहा हूँ। कबीर साहिब बोले – मैं अल्लाह हूँ। यह सुनकर शेख फरीद बोला – क्यों मेरे से मज़ाक़ कर रहे हो। अल्लाह ऐसा थोड़े ही न होता है। कबीर साहिब ने कहा कि कैसा होता है अल्लाह। शेख फरीद ने कहा कि अल्लाह तो बेचून है, निराकार है। कबीर साहिब बोले – सोच तू क्या बोल रहा है, और क्या कर रहा है। एक तरफ तो तुम कह रहे हो कि अल्लाह बेचून है, निराकार है। और दूसरी तरफ अल्लाह के दीदार (दर्शन) के लिए तप कर रहे हो। अल्लाह से साक्षात्कार करने के लिए इतना कठिन परिश्रम कर रहे हो और दूसरी तरफ कह रहे हो की अल्लाह निराकार है। 

यह सुनते ही शेख फरीद जान गया कि यह पुण्य आत्मा अल्लाह का जानकार है। शेख फरीद कबीर साहिब के चरणो में गिर गया और कहने लगा कि मुझे सत मार्ग बताईये, मैं बहुत दुखी हूँ। कबीर साहिब ने कहा कि तप से परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती। तप करने से इंसान राजा बनता है और राज भोगने के बाद फिर नरक और चौरासी लाख योनियों में दुःख उठाता है। तुम्हारे गुरुदेव ने तुम्हे गलत मार्ग दर्शन किया। वे अज्ञानी थे और तुम्हारा जीवन बर्बाद कर दिया। 

कबीर, ज्ञान हीन जो गुरु कहावे, आपन डूबे औरों डुबावे।

कबीर साहेब


तब शेख फरीद ने साकार परमात्मा, कबीर साहिब जी, से नाम उपदेश लिया और सतनाम का जाप किया अर्थात असली मंत्र का जाप किया। उसके बाद सतगुरु कबीर साहिब ने उसे सारशब्द दिया। जिसको प्राप्त करके शेख फरीद ने अपना जीवन सफल किया, सतलोक चला गया और पूर्ण मोक्ष प्राप्त किया।

Written by
Banti Kumar

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